Wednesday, January 20, 2010

आँगन-बदरा का प्यार

अंसुअन की धार है या बदरा का प्यार
जग तनिक भी खबर ना पाए

गिर कर आँगन से जो चोट पाए,
पानी आँगन को सहलाए.

आँगन बूंदों से चोट खाए,
पानी को गोद में ले सामये

गुमसुम आँगन बदरा निहारे,
तडपे पानी भी, जब सूखा पड़ जाए.

आँगन की बरसात में, पानी भीगा जाए,
आँगन सूना ही रहे, पानी आंसू बहाए..

प्यार है तकरार है, क्या रिश्ता है,
ये कविवर कभी समझ ना पाए.

4 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

wah, aangan-badaraa kaa umda chitran.

अनुराग तिवारी said...

धन्यवाद बन्धु

Anonymous said...

WONDERFUL WRITING.

Anonymous said...

WONDERFUL